तेहरान/वॉशिंगटन : पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बड़ी हलचल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समझौते संबंधी दावे के बाद ईरान ने भी बातचीत के लिए सहमति जताई है, लेकिन साफ कर दिया है कि यह कोई बिना शर्त समझौता नहीं होगा। अब दोनों देशों के बीच प्रस्तावित वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।
ईरान ने रखीं कड़ी शर्तें
ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि किसी भी समझौते से पहले अमेरिका को ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटाने होंगे, समुद्री नाकेबंदी समाप्त करनी होगी और जब्त की गई ईरानी संपत्तियां लौटानी होंगी। उनका कहना है कि तेहरान केवल आश्वासनों पर नहीं, बल्कि ठोस कदमों के बाद ही आगे बढ़ेगा।
ट्रंप का दावा- समझौता करीब
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर दावा किया कि दोनों देशों के बीच शांति समझौता लगभग तय हो चुका है। उन्होंने संकेत दिए कि समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य समुद्री व्यापार बहाल हो सकता है और क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद है।
19 जून की बैठक पर टिकी उम्मीदें
सूत्रों के अनुसार 19 जून को स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की अहम बैठक प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि इसी बैठक में समझौते के अंतिम मसौदे पर चर्चा होगी और आगे की रूपरेखा तय की जाएगी।
ईरान बोला- दबाव में नहीं झुके
ईरानी नेतृत्व का दावा है कि यह स्थिति उनकी सैन्य और कूटनीतिक मजबूती का परिणाम है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अपने कई रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सका और इसी वजह से वार्ता की राह खुली है।
अविश्वास अब भी बरकरार
ईरान ने स्पष्ट किया है कि समझौते की संभावना के बावजूद वह अमेरिका के हर कदम पर नजर रखेगा। तेहरान का मानना है कि केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर से भरोसा बहाल नहीं होगा, बल्कि अमेरिकी वादों का जमीन पर पालन होना भी जरूरी है।
पश्चिम एशिया के भविष्य का फैसला?
विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्विट्जरलैंड वार्ता सफल रहती है तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम हो सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी राहत मिलेगी। लेकिन किसी भी पक्ष के पीछे हटने की स्थिति में क्षेत्र फिर से संकट और टकराव की ओर बढ़ सकता है। फिलहाल ट्रंप के दावे और ईरान की सशर्त सहमति ने युद्ध की आशंकाओं के बीच शांति की उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन अंतिम फैसला अब स्विट्जरलैंड में होने वाली अहम बैठक पर निर्भर करेगा।
