CBSE के OSM ठेके पर उठे सवाल, समान काम के लिए लागत 28 करोड़ से बढ़कर 38 करोड़ कैसे हुई?

CBSE के OSM ठेके पर उठे सवाल, समान काम के लिए लागत 28 करोड़ से बढ़कर 38 करोड़ कैसे हुई?

Johar News Times
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नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ऑनस्क्रीन मार्किंग (OSM) परियोजना को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप तेज हो गए हैं। टेंडर दस्तावेजों और वर्क ऑर्डर की समीक्षा में सामने आया है कि समान कार्य और लगभग समान उत्तर पुस्तिकाओं की संख्या होने के बावजूद परियोजना की अनुमानित लागत 28 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 38.46 करोड़ रुपये कर दी गई। रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी और मई 2025 में जारी पहले दो टेंडरों में 2.38 करोड़ उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग और डिजिटल मूल्यांकन के लिए परियोजना लागत करीब 28 करोड़ रुपये आंकी गई थी। हालांकि, बाद में जारी तीसरे टेंडर और वर्क ऑर्डर में काम की प्रकृति लगभग समान रहने के बावजूद लागत बढ़ाकर 38.46 करोड़ रुपये कर दी गई। इस 10 करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी को लेकर सीबीएसई की ओर से अब तक कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

टेंडर प्रक्रिया में बदली गईं शर्तें

पहले टेंडर में कोई कंपनी बोली लगाने नहीं आई, जबकि दूसरे टेंडर में शामिल चार कंपनियां तकनीकी मानकों पर खरा नहीं उतर सकीं। इसके बाद तीसरे टेंडर में कई महत्वपूर्ण शर्तों में ढील दी गई। स्वचालित रोबोटिक स्कैनिंग की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई और स्कैनिंग रिजॉल्यूशन 300 DPI से घटाकर 200 DPI कर दिया गया। इन बदलावों के बाद हैदराबाद की कोएम्प्ट एजु टेक प्राइवेट लिमिटेड को ठेका मिला। कंपनी ने तकनीकी मूल्यांकन में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) को मामूली अंतर से पीछे छोड़ा, जबकि वित्तीय बोली में उसकी दरें टीसीएस की तुलना में करीब 60 प्रतिशत कम थीं।

काम और भुगतान के आंकड़ों में भी सवाल
सीबीएसई के अनुसार, कक्षा 12 की कुल 98.66 लाख उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग की गई। निर्धारित दर 25.74 रुपये प्रति उत्तर पुस्तिका के हिसाब से वास्तविक भुगतान लगभग 25.39 करोड़ रुपये बैठता है। ऐसे में विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि जब वास्तविक कार्य के आधार पर भुगतान 25 करोड़ रुपये के आसपास बनता है, तो 38.46 करोड़ रुपये का वर्क ऑर्डर किस आधार पर जारी किया गया।

पारदर्शिता पर उठे सवाल
शिक्षा मंत्रालय के तहत कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एडसिल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यदि समान कार्य के लिए लागत बढ़ाई जाती है, तो टेंडर जारी करने वाली संस्था को उसका स्पष्ट औचित्य बताना चाहिए। वहीं, सीबीएसई के अधिकारियों का कहना है कि अंतिम भुगतान वास्तविक रूप से स्कैन और मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकाओं की संख्या के आधार पर किया जाएगा। फिलहाल, परियोजना लागत में वृद्धि, टेंडर शर्तों में बदलाव और वास्तविक कार्य के मुकाबले अनुमानित खर्च के अंतर को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। मामले को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज हो रही है।

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