धालभूमगढ़ एकलव्य विद्यालय की बदहाली उजागर, दूसरे स्कूल के शिक्षकों के भरोसे चल रही पढ़ाई

हाईटेक सुविधाओं के दावे फेल, एक साल में दीवारों में दरारें; पास के मुरूम खनन से उड़ रही धूल में पढ़ने को मजबूर छात्र

Johar News Times
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आदिवासी और पिछड़े वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण एवं विश्वस्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए धालभूमगढ़ एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय की जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। आधुनिक सुविधाओं और हाईटेक शिक्षा के दावों के बीच विद्यालय शिक्षकों की भारी कमी, अधूरे संसाधनों और निर्माण संबंधी खामियों से जूझ रहा है। स्थिति ऐसी है कि विद्यालय का संचालन दूसरे स्कूल के शिक्षकों के भरोसे किया जा रहा है।

विद्यालय की सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों की कमी है। धालभूमगढ़ एकलव्य विद्यालय में अब तक एक भी स्थायी शिक्षक की नियुक्ति नहीं की गई है। वर्तमान में प्रभारी प्रधानाध्यापक शेख रूमीना यास्मीन समेत कुल चार शिक्षक यहां कार्यरत हैं, जो मूल रूप से गुड़ाबांदा एकलव्य विद्यालय के स्टाफ हैं। गर्मी की छुट्टियों के बाद अतिथि शिक्षकों (गेस्ट फैकल्टी) का अनुबंध नवीनीकृत नहीं होने के कारण वे वापस नहीं लौटे। इससे विद्यालय में शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं और पढ़ाई ठप होने की स्थिति बन गई है।

वर्तमान में विद्यालय में 128 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। कक्षा छह में 55 नए विद्यार्थियों के प्रवेश के बाद यह संख्या और बढ़ने वाली है। नियमों के अनुसार यहां कक्षा छह से बारहवीं तक पढ़ाई होनी चाहिए, लेकिन संसाधनों और शिक्षकों की कमी के कारण उच्च कक्षाएं अब तक शुरू नहीं हो सकी हैं। विद्यालय में फिलहाल केवल चार शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि सुचारू संचालन के लिए कम से कम 10 अतिरिक्त शिक्षकों की तत्काल आवश्यकता बताई जा रही है।

करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित विद्यालय भवन की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। भवन बने अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन कई जगहों पर दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें दिखाई देने लगी हैं। रंग-रोगन भी उखड़ने लगा है, जिससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्य में मानकों की अनदेखी की गई है, जिसकी वजह से भवन समय से पहले ही जर्जर होने लगा है।

हाईटेक और डिजिटल शिक्षा के दावों के बावजूद विद्यालय में बच्चों को आज भी ब्लैकबोर्ड के सहारे पढ़ाया जा रहा है। करोड़ों रुपये की लागत से बने इस संस्थान में स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षण सुविधाएं अब तक धरातल पर दिखाई नहीं दे रही हैं। अभिभावक सवाल उठा रहे हैं कि आधुनिक डिजिटल क्लासरूम और स्मार्ट शिक्षा के दावे आखिर फाइलों तक ही क्यों सीमित रह गए।

विद्यालय में केवल शिक्षकों की ही नहीं, सहायक कर्मचारियों की भी भारी कमी है। यहां न तो कोई चपरासी है और न ही माली। परिणामस्वरूप विद्यालय परिसर में उगी झाड़ियों और घास की नियमित सफाई नहीं हो पा रही है। इससे परिसर की स्वच्छता और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रही हैं।

विद्यालय परिसर से सटे क्षेत्र में चल रहे ग्रेवल (मुरूम) खनन ने छात्रों की परेशानी और बढ़ा दी है। खनन क्षेत्र से उड़ने वाली धूल छात्रावास और कैंटीन तक पहुंच रही है। बचाव के नाम पर केवल टीन की एक अस्थायी घेराबंदी की गई है, जो प्रभावी साबित नहीं हो रही। स्थानीय लोगों का सवाल है कि विद्यालय शुरू होने से पहले खनन क्षेत्र को यहां से स्थानांतरित क्यों नहीं किया गया।

विद्यालय की बदहाल स्थिति को लेकर अभिभावकों और ग्रामीणों में गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं।

ग्रामीणों और अभिभावकों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि—

  • विद्यालय में कम से कम 10 नए शिक्षकों की तत्काल नियुक्ति की जाए।
  • माली, चपरासी और रसोइयों जैसे सहायक कर्मचारियों की बहाली की जाए।
  • विद्यालय परिसर के पास चल रहे खनन कार्य से होने वाले प्रदूषण पर रोक लगाई जाए या खनन क्षेत्र को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाए।
  • भवन निर्माण कार्य की उच्चस्तरीय गुणवत्ता जांच कराई जाए।
  • दोषी ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

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