*गौरी जमीन खरीद विवाद में बड़ी कार्रवाई: डॉ. डीपी शुक्ला समेत तीन सदस्य उत्तर प्रदेश संघ से निष्कासित*

"पौने 8 करोड़ का जमीन घोटाला: उत्तर प्रदेश संघ की बड़ी कार्रवाई, डॉ. डीपी शुक्ला समेत तीन पदाधिकारी निष्कासित"

Johar News Times
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● पौने 8 करोड़ की जमीन खरीद में अनियमितता का आरोप, एमएनपीएस सचिव पद से भी हटाए गए डॉ. शुक्ला; कार्यालय आने पर रोक

● उच्चस्तरीय जांच में सामने आईं कई गड़बड़ियां, आमसभा और कार्यकारिणी को विश्वास में लिए बिना हुआ जमीन सौदा

जमशेदपुर : चांडिल प्रखंड के गौरी गांव में साढ़े चार एकड़ जमीन की खरीद को लेकर उठे विवाद के बाद उत्तर प्रदेश संघ ने बड़ी कार्रवाई करते हुए डॉ. डीपी शुक्ला, विजय सिंह राणा और देवेश अवस्थी की सदस्यता समाप्त कर दी है। तीनों को संस्था के संविधान के विरुद्ध कार्य करने और जमीन खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का दोषी पाया गया है। यह निर्णय बुधवार को उत्तर प्रदेश संघ की कार्यकारिणी समिति की बैठक में लिया गया।

जमीन खरीद मामले में गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट पर चर्चा के बाद कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से कार्रवाई का फैसला लिया। इसके साथ ही डॉ. डीपी शुक्ला को मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के सचिव पद की जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया गया है। उनकी जगह फिलहाल संयुक्त सचिव ललन प्रसाद राय महासचिव का कार्यभार संभालेंगे। डॉ. शुक्ला के कार्यालय आने पर भी रोक लगा दी गई है और इस संबंध में सूचना उत्तर प्रदेश संघ तथा एमएनपीएस के सभी नोटिस बोर्डों पर चस्पां कर दी गई है।

*कार्यकारिणी बैठक में हुआ फैसला*

उत्तर प्रदेश संघ की कार्यकारिणी समिति की बैठक अध्यक्ष अखिलेश दुबे की अध्यक्षता में हुई। बैठक के लिए महासचिव डॉ. डीपी शुक्ला को छोड़कर सभी सदस्यों को विधिवत आमंत्रित किया गया था।

बैठक में उपाध्यक्ष रवि दुबे एवं ओंकार नाथ सिंह, संयुक्त सचिव ललन प्रसाद राय, कोषाध्यक्ष गिरीश तिवारी तथा कार्यसमिति सदस्य उमा शंकर शर्मा और विनोद कुमार सिंह ने जांच रिपोर्ट का दोबारा अध्ययन किया। सदस्यों ने अध्यक्ष अखिलेश दुबे पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाया, जिसके बाद तीनों को संस्था से निष्कासित करने का निर्णय लिया गया।

कार्यसमिति सदस्य तरुणकांत सिंह अमेरिका में होने के कारण बैठक में शामिल नहीं हो सके। उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से सभी दस्तावेज भेजे गए, जिसके बाद उन्होंने भी कार्रवाई पर सहमति जताई। संयुक्त सचिव शिवशंकर मिश्रा पारिवारिक शोक के कारण रांची चले गए थे, जबकि कार्यकारिणी सदस्य वैजनाथ दुबे बैठक में उपस्थित नहीं हुए।

*कौन हैं तीनों पदाधिकारी?*

वर्ष 2019 में विजय सिंह राणा उत्तर प्रदेश संघ के अध्यक्ष, डॉ. डीपी शुक्ला महासचिव और देवेश अवस्थी कोषाध्यक्ष थे। विजय सिंह राणा टाटा स्टील के पूर्व प्रबंध निदेशक के निजी सहायक रह चुके हैं, जबकि डॉ. डीपी शुक्ला वर्कर्स कॉलेज के पूर्व प्राचार्य रहे हैं।

*क्या है पूरा मामला?*

मामला सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अंचल स्थित गौरी गांव में लगभग पौने 8 करोड़ रुपये में खरीदी गई साढ़े चार एकड़ जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि इतनी बड़ी राशि का सौदा कार्यकारिणी समिति और आमसभा को पूरी जानकारी दिए बिना किया गया। जांच समिति के अनुसार संस्था के संविधान के मुताबिक जमीन खरीदने से पहले कार्यकारिणी समिति की स्वीकृति और आमसभा में योजना एवं बजट की मंजूरी आवश्यक थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

*कोरोना काल का दिया गया था तर्क*

जांच के दौरान सफाई दी गई कि जमीन खरीद की प्रक्रिया के दौरान कोरोना काल शुरू हो गया था, इसलिए कार्यकारिणी या आमसभा से चर्चा नहीं हो सकी। यहां तक कहा गया कि ऑनलाइन बैठक आयोजित करने के लिए भी कोई लिंक तैयार नहीं किया जा सका। जांच समिति ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना।

*कैसे हुई जमीन खरीद की प्रक्रिया?*

रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2019 में कार्यकारिणी समिति की बैठक में केवल जमीन खरीदने की सामान्य चर्चा हुई थी। यह नहीं बताया गया कि जमीन कहां स्थित है, कितनी कीमत की है और किस उद्देश्य से खरीदी जाएगी। आरोप है कि उसी दिन विजय सिंह राणा और डॉ. डीपी शुक्ला ने अलग से निर्णय लेकर गौरी गांव की जमीन खरीदने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला कर लिया। इसके बाद मार्च 2020 में ऐसे फर्म को अग्रिम भुगतान कर दिया गया जिसे उस समय तक भूमि विक्रेता अतुल टॉक और अनाहिता टॉक ने अधिकृत भी नहीं किया था। बाद में जुलाई 2020 में जमीन की रजिस्ट्री कराई गई।

*छह साल बाद भी नहीं हो सकी पूरी घेराबंदी*

जांच में यह भी सामने आया कि जमीन खरीद के छह वर्ष बाद भी उसकी पूरी घेराबंदी नहीं हो सकी है। वर्ष 2023 में नई कार्यकारिणी के गठन के बाद यह जानकारी सामने आई कि भूमि विवाद के कारण निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

*दो बार हुई आंतरिक जांच*

जमीन विवाद सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश संघ ने दो बार जांच कराई। पहली बार कार्यकारिणी समिति ने अशोक पांडेय के नेतृत्व में जांच समिति बनाई। समिति ने पाया कि जमीन खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था और कई अन्य अनियमितताएं भी हुई थीं।

जब यह रिपोर्ट वार्षिक आमसभा में रखी गई तो डॉ. डीपी शुक्ला ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। इसके बाद आमसभा में डॉ. डीपी शुक्ला और अध्यक्ष अखिलेश दुबे की सहमति से अनुराग अग्निहोत्री के नेतृत्व में उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया गया। इसकी वीडियोग्राफी भी उपलब्ध है। समिति ने डॉ. शुक्ला और विजय सिंह राणा का लिखित पक्ष लिया और कार्यकारिणी बैठकों की कार्यवाही का विस्तृत अध्ययन किया।

*आदिवासी जमीन होने पर उठे सवाल*

जांच समिति ने पाया कि जिस जमीन को सीएनटी एक्ट से मुक्त बताकर खरीदा गया, वह 1964 के भू-सर्वे खतियान में मोहन सिंह सरदार उर्फ मोहन सिंह भूमिज नामक आदिवासी रैयत के नाम दर्ज है।

रिपोर्ट के अनुसार दावा किया गया कि वर्ष 1967 से 1973 के बीच जगरूप सिंह नामक गैर-आदिवासी व्यक्ति को लंबे समय तक दखल के आधार पर सरायकेला न्यायालय से स्वामित्व प्राप्त हुआ था और उसी आधार पर जमीन आदिवासी से गैर-आदिवासी के नाम हस्तांतरित हुई। लेकिन जांच के दौरान इस दावे से संबंधित न्यायिक आदेश का कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका। स्वयं विजय सिंह राणा और डॉ. डीपी शुक्ला ने समिति को बताया कि संबंधित न्यायिक आदेश उनके पास भी उपलब्ध नहीं है।

*कानूनी विशेषज्ञों ने भी जताई शंका*

उच्चस्तरीय जांच समिति ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिजीत मंडल और मलकित सिंह से कानूनी राय ली।

अधिवक्ता अभिजीत मंडल ने कहा कि जमीन का म्यूटेशन तो हुआ है, लेकिन कई ऐसे तथ्य हैं जो संदेह उत्पन्न करते हैं। उनके अनुसार इस जमीन में निवेश उचित नहीं माना जा सकता।

*म्यूटेशन में भी मिला विरोधाभास*

जांच रिपोर्ट में कहा गया कि जगरूप सिंह के पक्ष में कथित न्यायिक आदेश के आधार पर भूमि का म्यूटेशन हुआ। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से म्यूटेशन आदेश में भी वह न्यायिक आदेश संलग्न नहीं मिला। जांच समिति ने इसे गंभीर विसंगति माना और कहा कि जमीन के स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों में स्पष्टता का अभाव है।

*तीन खतियानों में दर्ज है भूमि*

गौरी गांव में खरीदी गई भूमि तीन अलग-अलग खातों में दर्ज है।

* खाता संख्या 34 में रैयत मोहन सिंह सरदार (अनुसूचित जनजाति)

* खाता संख्या 131 में रैयत मोहन सिंह सरदार (अनुसूचित जनजाति)

* खाता संख्या 125 में भी मोहन सिंह का नाम दर्ज, लेकिन जाति और पिता का नाम अंकित नहीं

जांच में यह भी सामने आया कि ऑनलाइन अभिलेखों में केवल एक खाते में जगरूप सिंह, अतुल-अनाहिता टॉक और उत्तर प्रदेश संघ का नाम दिखाई देता है, जबकि अन्य दो खातों में स्थिति स्पष्ट नहीं है।

*रैयतों से हुआ दो करोड़ रुपये का सुलहनामा*

जमीन खरीद के बाद मूल खतियानी रैयत मोहन सिंह सरदार के वंशजों ने न्यायालय में वाद दायर किया और मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा।

इसके बाद डॉ. डीपी शुक्ला ने रैयत परिवार के साथ सुलहनामा किया। समझौते के तहत प्रति डिसमिल राशि देने, मुकदमा वापस लेने और भविष्य में विद्यालय बनने पर रोजगार उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया। इस सुलहनामे के तहत उत्तर प्रदेश संघ को लगभग दो करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे। बाद में रैयत परिवार ने अपना मुकदमा वापस ले लिया।

*ट्रस्ट गठन और चहारदीवारी निर्माण पर भी सवाल*

जांच में यह भी सामने आया कि अपने कार्यकाल के दौरान विजय सिंह राणा और डॉ. डीपी शुक्ला ने उत्तर प्रदेश संघ ट्रस्ट का गठन किया और स्वयं उसके संस्थापक ट्रस्टी बन गए।

ट्रस्ट को उत्तर प्रदेश संघ की एक इकाई के रूप में स्थापित किया गया। जांच समिति के अनुसार वर्तमान कार्यकारिणी द्वारा जमीन विवाद की जांच पूरी होने तक किसी भी प्रकार के निवेश और चहारदीवारी निर्माण पर रोक लगाने के बावजूद चहारदीवारी निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। आरोप है कि बिना खुली निविदा के ट्रस्ट के माध्यम से निर्माण कार्य शुरू कराया गया। जांच समिति ने समान उद्देश्य के लिए अलग ट्रस्ट बनाने की प्रासंगिकता और औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है।

*अध्यक्ष का बयान*

उत्तर प्रदेश संघ के अध्यक्ष अखिलेश दुबे ने कहा कि गौरी गांव भूमि खरीद प्रकरण की जांच रिपोर्ट का विस्तृत अध्ययन किया गया। जांच समिति द्वारा दोषी पाए जाने पर डॉ. डीपी शुक्ला, विजय सिंह राणा और देवेश अवस्थी की सदस्यता समाप्त कर दी गई है। उन्होंने कहा कि डॉ. शुक्ला की जगह फिलहाल ललन प्रसाद राय महासचिव का कार्यभार संभालेंगे और जल्द ही आमसभा बुलाकर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

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