G7 समिट: समुद्री तनाव और कूटनीतिक तल्खी के बीच 17 जून को होगी मोदी-ट्रंप की महामुलाकात, दुनिया की नजरें

"तनाव के समंदर के बीच कूटनीति की नई लहर: G7 में मोदी-ट्रंप की महामुलाकात पर टिकी दुनिया की नजर।"

Johar News Times
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फ्रांस के एवियां-ले-बैं में आयोजित हो रहे G7 शिखर सम्मेलन के इतर 17 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। हाल के दिनों में समुद्री सुरक्षा से जुड़े गंभीर घटनाक्रमों और कूटनीतिक मोर्चे पर बढ़ी तल्खी के बाद दोनों महानेताओं के बीच यह पहली आमने-सामने की बातचीत होगी। भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से इस वार्ता को बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कूटनीतिक तनाव के बीच पहली सीधी बातचीत

पिछले कुछ समय में भारत और अमेरिका के रिश्तों में कूटनीतिक स्तर पर गर्माहट देखी गई है। संवेदनशील मामलों को लेकर नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत को दो बार तलब किया जा चुका है। ऐसे माहौल में दोनों नेताओं की यह मुलाकात दोनों देशों के बीच मौजूद मतभेदों को सुलझाने और सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का एक बड़ा मंच बनेगी।

समुद्री सुरक्षा और भारतीय नाविकों का मुद्दा रहेगा अहम

सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक का सबसे बड़ा एजेंडा समुद्री मार्गों की सुरक्षा होगा। हाल ही में वाणिज्यिक समुद्री जहाजों पर हुए हमलों और अमेरिकी कार्रवाई में भारतीय नाविकों की मौत को लेकर भारत ने अपनी चिंताओं को बेहद सख्त और स्पष्ट रूप से अमेरिका के सामने रखा है।

  • वार्ता में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर विशेष जोर रहेगा।
  • भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के सम्मान और सुरक्षित व्यापारिक मार्गों की वकालत करता रहा है।
  • दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाने पर भी रणनीतिक चर्चा कर सकते हैं।

द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक समझौते पर भी चर्चा संभव

सुरक्षा चिंताओं के साथ-साथ दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौते की प्रगति की समीक्षा भी की जा सकती है। भारत और अमेरिका एक ऐसे आर्थिक समझौते की ओर बढ़ रहे हैं जिससे दोनों देशों के व्यापारिक हितों को बढ़ावा मिल सके।

G7 के मंच से वैश्विक स्थिरता का संदेश

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालातों के बीच मोदी-ट्रंप की यह मुलाकात केवल भारत-अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगी। फ्रांस की धरती से होने वाली यह वार्ता पूरी दुनिया को वैश्विक सुरक्षा, समुद्री स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को लेकर एक बड़ा और कूटनीतिक संदेश दे सकती है।

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