पश्चिमी सिंहभूम जिले में रविवार को ओड़िया समाज का पारंपरिक और बेहद लोकप्रिय पर्व रजो संक्रांति अटूट श्रद्धा, उत्साह और सांस्कृतिक उमंग के साथ मनाया गया। सुबह से ही विभिन्न मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई, जहां लोगों ने नए वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना की और परिवार तथा समाज की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
मेहंदी से सजे हाथ और पारंपरिक झूलों की मची धूम
इस उत्सव का मुख्य आकर्षण महिलाएं, युवतियां और बच्चे रहे, जो रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे नजर आए। छोटी बच्चियों और कुंवारी कन्याओं ने हाथों में खूबसूरत मेहंदी रचाई और गांवों तथा बस्तियों में जगह-जगह लगाए गए झूलों का जमकर आनंद लिया।
गांवों में गूंजे ओड़िया लोकगीत
जैसे ही चाईबासा और आसपास के ओड़िया बहुल इलाकों में झूले सज कर तैयार हुए, युवतियों के कंठ से पारंपरिक लोकगीत फूट पड़े। पूरा क्षेत्र “बनस्ते डाकिला गजो, बरषके थरे आसिछी रोजो” (जंगल में हाथी चिंघाड़ रहा है, साल में एक बार रजो पर्व आया है) जैसे सुरीले गीतों से गुंजायमान हो उठा। इस दौरान समूचे पश्चिमी सिंहभूम में समृद्ध ओड़िया संस्कृति और अनूठी परंपरा की मनमोहक झलक देखने को मिली।
रसोई में महके पारंपरिक व्यंजन, एक साथ जुटा परिवार
पर्व के खास मौके पर ओड़िया परिवारों के घरों में चावल के आटे, गुड़ और नारियल से बने विभिन्न प्रकार के पारंपरिक व्यंजन (विशेषकर ‘पोड़ो पीठा’ और ‘मंडा पीठा’) तैयार किए गए। आधुनिकता के इस दौर में भी परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर इस उत्सव का स्वाद और आनंद लेते नजर आए।
चार दिनों तक चलता है यह रजो उत्सव:
ओड़िया समाज की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा यह महापर्व पूरे चार दिनों तक पूरी विधि-विधान से मनाया जाता है:
- पहला दिन: पहिली रजो
- दूसरा दिन: मिथुन संक्रांति
- तीसरा दिन: भूदाहा या बासी रजो
- चौथा दिन: बसुमती स्नान या शुद्धिकरण स्नान
नारीत्व और धरती माता के सम्मान का महापर्व मूल रूप से ओड़िशा से जुड़े इस पर्व का झारखंड के सीमावर्ती जिलों में भी गहरा प्रभाव है। यह पर्व आषाढ़ महीने में वर्षा ऋतु के आगमन का स्वागत करता है। इसे ‘धरती माता के रजस्वला होने’ और ‘नारीत्व के सम्मान’ का अनूठा प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि यह पर्व न सिर्फ धार्मिक आस्था, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की एक मजबूत मिसाल पेश करता है।
