झारखंड उच्च न्यायालय (High Court) ने बालू घाटों के आवंटन और सरकारी नीतियों में अचानक हुए बदलावों के कारण व्यवसायियों को होने वाले वित्तीय नुकसान पर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार को कड़ा निर्देश दिया है कि जिस अवधि में आवंटित कंपनी तकनीकी या नीतिगत कारणों से खनन कार्य नहीं कर सकी, उस अवधि की अग्रिम बोली राशि (Bid Amount) उसे वापस की जाए।
इतना ही नहीं, अदालत ने साफ किया है कि सरकार को इस रोकी गई राशि पर 15 अक्टूबर 2012 से लेकर वास्तविक भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज (Simple Interest) भी देना होगा। यह बड़ा आदेश ‘जीआई एंड फाइनेंस कंपनी’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद आया है। हालांकि, कोर्ट ने कंपनी की रॉयल्टी, रजिस्ट्रेशन शुल्क और स्टांप ड्यूटी को वापस करने संबंधी अन्य मांगों को खारिज कर दिया।
क्या था पूरा विवाद? (3 साल का पट्टा और बीच में बदली शर्तें)
मामले की पृष्ठभूमि साल 2011 से जुड़ी है, जब जीआई एंड फाइनेंस कंपनी ने खुली नीलामी में धनबाद जिले के पांच (5) प्रमुख बालू घाटों का तीन वर्षों के लिए कानूनी खनन अधिकार हासिल किया था। कंपनी ने तय नियमों के मुताबिक बोली की कुल राशि का 80 प्रतिशत हिस्सा सरकारी खजाने में जमा कर सुचारू रूप से खनन कार्य शुरू कर दिया था।
विवाद तब शुरू हुआ जब जून 2012 में राज्य सरकार ने अचानक कंपनी को ट्रांजिट चालान (Transit Challan) जारी करना बंद कर दिया। सरकार का तर्क था कि कंपनी के पास केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ‘पर्यावरणीय स्वीकृति’ (Environmental Clearance) नहीं है।
कंपनी का मुख्य तर्क: कंपनी ने अदालत में पुरजोर तरीके से कहा कि मूल नीलामी सूचना (Auction Notice), आधिकारिक स्वीकृति पत्र (Approval Letter) और अंतिम लीज समझौते (Lease Agreement) में पर्यावरणीय मंजूरी लेने की ऐसी कोई शर्त अनिवार्य नहीं की गई थी। सरकार ने बीच रास्ते में नियम बदलते हुए इसे जबरन लागू किया, जिससे खनन कार्य ठप हो गया और घाटे के कारण कंपनी को पांचों घाट बीच में ही सरेंडर (वापस) करने पड़े।
अदालत की सख्त टिप्पणी: कंपनी पर नहीं डाला जा सकता नीतिगत बदलावों का बोझ
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया। अदालत ने अपने फैसले में कहा:
- पट्टा (Lease) देते समय यदि पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्त अनुबंध में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं थी, तो बाद में लागू की गई नई शर्तों का पूरा आर्थिक नुकसान और बोझ अकेले कंपनी पर नहीं मढ़ा जा सकता।
- सरकार द्वारा चालान रोके जाने के बाद कंपनी के पास दो ही वैध रास्ते थे—या तो वह लंबी प्रक्रिया से पर्यावरण क्लीयरेंस ले या घाट वापस कर दे। कंपनी ने घाट सरेंडर करने का कानूनी विकल्प चुना, इसलिए वह अपनी जमा राशि ब्याज सहित वापस पाने की हकदार है।
दूरगामी होगा इस फैसले का असर
हाईकोर्ट के इस फैसले को झारखंड में बालू खनन पट्टों, ठेकेदारी और सरकारी नीतिगत बदलावों से जुड़े विवादों में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इस निर्णय के बाद अब सरकार बिना पुख्ता तैयारी और स्पष्ट नियमों के ठेकेदारों या कंपनियों पर बीच अवधि में मनमाने नियम नहीं थोप पाएगी।
