बच्चों में बढ़ रही है तुरंत शॉपिंग की ‘लत’? पैरेंट्स आज ही सिखाएं 4 Golden Rules, सुरक्षित रहेगा भविष्य

आज के बच्चों में किसी चीज के लिए 'इंतजार करने' का धैर्य खत्म होता जा रहा है।

Johar News Times
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mother and daughter shopping for toys

आज का दौर ‘इंस्टेंट’ (Instant) का है। 10 मिनट में ग्रोसरी डिलीवरी, एक क्लिक पर ऑनलाइन शॉपिंग और मनचाहा सामान घर के दरवाजे पर। इस डिजिटल चकाचौंध ने बड़ों के साथ-साथ बच्चों की आदतें भी बदल दी हैं। आज के बच्चों में किसी चीज के लिए ‘इंतजार करने’ का धैर्य खत्म होता जा रहा है। शिशु रोग विशेषज्ञों और फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों की हर जिद को तुरंत पूरा करना आगे चलकर उन्हें Impulsive Buyer (बिना सोचे-समझे खर्च करने वाला) बना देता है। ऐसे में पैरेंट्स की जिम्मेदारी है कि वे बचपन से ही बच्चों को ‘स्मार्ट मनी मैनेजमेंट’ सिखाएं, ताकि वे भविष्य में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।

यहाँ हैं वो 4 आसान तरीके, जो बच्चों को फिजूलखर्ची से दूर रखेंगे:

1. ‘पिग्गी बैंक’ से लेकर ‘गोल सेटिंग’ तक का सफर

बच्चों को केवल “पैसे बचाओ” कहने से काम नहीं चलेगा, उन्हें एक लक्ष्य (Goal) दीजिए।

  • क्या करें: अगर बच्चा कोई महंगी साइकिल, गैजेट या खिलौना चाहता है, तो उसे वह तुरंत खरीदकर देने के बजाय उसके लिए पैसे जोड़ने को कहें।
  • फायदा: जब बच्चा अपनी पॉकेट मनी या तोहफे में मिले पैसों को बचाकर खुद वह चीज खरीदेगा, तो उसे उस सामान की असली कीमत और अपनी मेहनत का अहसास होगा।

2. ‘चाहत’ और ‘जरूरत’ का फर्क समझाना जरूरी

डिजिटल दौर में बच्चे हर आकर्षक चीज को अपनी ‘जरूरत’ समझ लेते हैं। पैरेंट्स को उन्हें Needs vs Wants का अंतर बताना होगा।

  • जरूरत : स्कूल की किताबें, हेल्दी फूड और जरूरी कपड़े, जिनके बिना काम नहीं चल सकता।
  • चाहत : महंगे ब्रांडेड जूते, वीडियो गेम या हर हफ्ते बाहर का खाना, जिसके बिना भी लाइफ आसानी से चल सकती है।
  • स्मार्ट पैरेंटिंग: अगली बार जब आप सुपरमार्केट जाएं, तो बच्चे को ट्रॉली में सामान रखने से पहले यह सोचने को कहें कि यह ‘जरूरत’ है या सिर्फ ‘इच्छा’।

3. पॉकेट मनी: खर्च का साधन नहीं, बल्कि लर्निंग टूल

पॉकेट मनी को केवल बच्चे के ऐश-ओ-आराम का जरिया न बनने दें। इसे उनके लिए एक फाइनेंशियल प्रैक्टिकल क्लास बनाएं।

  • बजटिंग सिखाएं: बच्चे को एक निश्चित मासिक या साप्ताहिक पॉकेट मनी दें। उन्हें सिखाएं कि इस पैसे को तीन हिस्सों में बांटना है- खर्च (Spend), बचत (Save), और मदद (Give)
  • खुद लेने दें फैसले: अगर बच्चा महीने के पहले हफ्ते में ही सारे पैसे उड़ा देता है, तो उसे दोबारा पैसे न दें। उसे अपनी गलती का नतीजा भुगतने दें ताकि वह अगली बार बजट बनाकर चले।

4. ‘कमाई’ और ‘बचत’ का लाइव उदाहरण बनें

बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। अगर पैरेंट्स खुद हर दिन ऑनलाइन शॉपिंग के पार्सल मंगा रहे हैं, तो बच्चे भी वही करेंगे।

  • घर के छोटे-मोटे वित्तीय फैसलों में बच्चों को शामिल करें। जैसे- इस महीने का बिजली बिल कम कैसे करना है या घर के राशन का बजट कैसे मैनेज करना है।
  • उन्हें बताएं कि आपकी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा सीधे सेविंग्स में जाता है, उसके बाद ही बाकी खर्च होते हैं।

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