स्थानीय पीवीएसएस डीएवी पब्लिक स्कूल में डीएवी का स्थापना दिवस अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और गरिमामय वातावरण में मनाया गया। इस विशेष अवसर पर पूरा विद्यालय परिसर वैदिक संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और शैक्षिक उत्कृष्टता के संदेश से सराबोर नजर आया। कार्यक्रम में विद्यालय के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं और कर्मचारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और डीएवी की गौरवशाली परंपरा को याद किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार और भव्य हवन-यज्ञ के साथ हुआ। यज्ञ में उपस्थित सभी शिक्षकों और कर्मियों ने आहुतियां अर्पित कीं। इस दौरान विश्व शांति, मानव कल्याण, राष्ट्र की समृद्धि और विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई। वैदिक मंत्रों की पवित्र ध्वनि से समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता से आलोकित हो उठा।
इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य श्री कृष्ण कुमार सिंह ने डीएवी के इतिहास और इसकी गौरवशाली विरासत पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया:
“डीएवी (दयानंद एंग्लो वैदिक) संस्थाओं की स्थापना महर्षि दयानंद सरस्वती के वैदिक आदर्शों और उनकी शिक्षाओं से प्रेरित होकर की गई थी। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए 1 जून 1886 को डीएवी कॉलेज मैनेजिंग कमेटी के तत्वावधान में लाहौर में प्रथम डीएवी विद्यालय/महाविद्यालय की स्थापना की गई थी, जिसके प्रथम अवैतनिक प्राचार्य के रूप में महात्मा हंसराज ने अपना अमूल्य योगदान दिया था।”
प्राचार्य ने आगे कहा कि आज डीएवी भारत के सबसे बड़े गैर-सरकारी शैक्षणिक संगठनों में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनमें मानवीय मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रसेवा की भावना का विकास करना भी है।
आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति का अनूठा संगम
प्राचार्य श्री सिंह ने बदलते दौर का जिक्र करते हुए कहा कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में डीएवी की शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों से भी बांधे रखती है। यही वजह है कि आज डीएवी के छात्र देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में ऊंचे मुकाम हासिल कर संस्थान और देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
