सरायकेला: ‘अतिक्रमणकारी हम हैं या हाथी?’— ईचागढ़ के ग्रामीणों ने विकास की अंधी दौड़ पर उठाए गंभीर सवाल

हाथियों को अतिक्रमणकारी कहने वाले हम इंसान खुद सबसे बड़े कब्जाधारी हैं।

Johar News Times
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सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों हाथियों की मौजूदगी दहशत का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय बनी हुई है। हाथियों के गांवों में प्रवेश को लेकर जहां एक ओर प्रशासन परेशान है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीणों ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है— “वन्य जीव पहले आए या मानव समुदाय? आखिर जिनकी जमीन पर हमने कब्जा किया, उन्हें ही हम अतिक्रमणकारी कैसे कह सकते हैं?”

ईचागढ़ के ग्रामीणों के बीच चर्चा का मुख्य केंद्र हाथियों का अस्तित्व है। लोगों का कहना है कि आज हम समाज के विभिन्न वर्गों के अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन उन बेजुबानों के बारे में कोई नहीं सोचता जिनका घर हमने उजाड़ दिया।

  • गांवों में घुसने पर हाथियों को खदेड़ा जाता है और शहरों में हंगामा मच जाता है। सवाल यह है कि उनके प्राकृतिक ठिकानों से छेड़छाड़ किसने शुरू की?
  • जंगलों में अंधाधुंध कटाई, अवैध कब्जा और हर साल लगने वाली आग ने हाथियों के लिए भोजन और पानी का संकट पैदा कर दिया है।

बुजुर्गों की मानें तो दलमा से पलायन कर हाथी अब ईचागढ़, कुकड़ू और चांडिल के रिहाइशी इलाकों में भटकने को मजबूर हैं। इसका सबसे बड़ा कारण हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर का नष्ट होना है। हाथियों के रास्तों पर अब:

  1. खनन गतिविधियां बढ़ गई हैं।
  2. चौड़ी सड़कें और नई बस्तियां बस गई हैं।
  3. जंगलों के बीचों-बीच बड़े-बड़े खेत बना लिए गए हैं।

ग्रामीणों ने पुराने समय को याद करते हुए कहा कि एक दौर था जब इंसान और जानवर एक ही नदी के तट पर साथ पानी पीते थे। आज विकास के नाम पर वन्यजीवों को उनके अधिकारों से बेदखल कर दिया गया है। ग्रामीणों का स्पष्ट मानना है कि यदि हाथियों को सुरक्षित जंगल और भोजन नहीं मिलेगा, तो मानव-हाथी संघर्ष को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता।

ईचागढ़ के लोगों का यह संदेश प्रशासन और समाज के लिए एक चेतावनी है कि विकास जरूरी है, लेकिन वह जंगल और बेजुबानों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

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