झारखंड राज्य गठन के बाद पूर्वी सिंहभूम के नक्सल प्रभावित गुड़ाबांदा में पहला मॉडल प्रखंड भवन बनाया गया था, लेकिन प्रशासनिक अस्थिरता के कारण विकास कार्य लगातार प्रभावित होते रहे। हालात यह हैं कि पिछले 17 वर्षों में यहां 17 बीडीओ की पदस्थापना हुई, जिनमें केवल चार अधिकारी ही अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा कर सके, जबकि अधिकांश अधिकारियों ने प्रभार व्यवस्था के तहत प्रखंड का संचालन किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि नियमित अधिकारियों की कमी के कारण योजनाओं के क्रियान्वयन, मनरेगा कार्य, राजस्व मामलों और विकास परियोजनाओं पर असर पड़ा। लंबे समय तक धालभूमगढ़ और बहरागोड़ा के बीडीओ को अतिरिक्त प्रभार देकर प्रशासनिक कामकाज चलाया गया।
17 वर्षों में गुड़ाबांदा में रहे बीडीओ
- अमर कुमार
- अरुण कुमार खलको
- श्रीराम महतो
- कुमार कोड़े
- राजेश कुमार साहू
- अशोक कुमार मोर
- सदानंद महतो
- करमाली
- स्मिता नगेशिया
- केशव भारती
- अमन कुमार
- डागुर कोड़ा समेत कुल 17 अधिकारियों ने अलग-अलग अवधि में प्रखंड की जिम्मेदारी संभाली।
प्रभार व्यवस्था से प्रभावित हुए विकास कार्य
- कई बीडीओ कुछ महीनों में ही स्थानांतरित हो गए।
- प्रखंड में योजनाओं की मॉनिटरिंग प्रभावित रही।
- मनरेगा से जुड़े रिकॉर्ड और कार्यों में गड़बड़ी के आरोप लगे।
- अंचल कार्यालय में भी लगातार बदलाव से राजस्व मामलों का निष्पादन प्रभावित हुआ।
- ग्रामीणों को प्रमाण पत्र, जमीन और विकास योजनाओं से जुड़े कार्यों के लिए परेशानी उठानी पड़ी।
कुछ अधिकारियों ने सुधार की कोशिश भी की
मार्च 2014 से जुलाई 2016 तक पदस्थापित रहे अशोक कुमार ने प्रखंड कार्यालय के दस्तावेजों को व्यवस्थित करने और लंबित मामलों को दुरुस्त करने का प्रयास किया। वहीं, कुछ अन्य अधिकारियों ने भी विकास योजनाओं को गति देने की कोशिश की, लेकिन लगातार तबादलों के कारण स्थायी सुधार नहीं हो सका। ग्रामीणों का मानना है कि यदि गुड़ाबांदा जैसे संवेदनशील और नक्सल प्रभावित प्रखंड में अधिकारियों की स्थायी नियुक्ति हो और उन्हें पर्याप्त समय तक काम करने का अवसर मिले, तो विकास योजनाओं को जमीन पर बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है।
