सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए जून 2026 का महीना बेहद खास और आध्यात्मिक रूप से चमत्कारी होने जा रहा है। पूरे 3 साल के लंबे इंतजार के बाद इस बार ‘अधिक मास’ (मलमास) में महादेव और भगवान विष्णु की संयुक्त कृपा धरती पर बरसने वाली है। 13 जून 2026 को आने वाली अधिक मास की शिवरात्रि पर ‘हरि-हर’ महासंयोग का निर्माण हो रहा है, जो सामान्य दिनों की शिवरात्रि से हजार गुना अधिक फलदायी माना जा रहा है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस विशेष दिन ग्रहों की स्थिति इतनी अनुकूल है जो कुंडली के सबसे भयंकर ‘विष दोष’ और चंद्रमा की कमजोरी को भी शुभता में बदल सकती है।
3 साल बाद क्यों आता है ‘अधिक मास’? जानें इसके पीछे का विज्ञान
कैलेंडर और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, पाठकों के लिए इसके पीछे का गणित समझना बेहद जरूरी है:
- सौर वर्ष (Solar Year): सूर्य पर आधारित कैलेंडर में एक वर्ष लगभग 365 दिन और 6 घंटे का होता है।
- चंद्र वर्ष (Lunar Year): चंद्रमा पर आधारित कैलेंडर में एक वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है।
- समाधान: इन दोनों वर्षों के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। इसी अंतर को पाटने और सौर-चंद्र कैलेंडरों में संतुलन बनाए रखने के लिए हर तीसरे साल (32 महीने, 16 दिन और 4 घटी के बाद) 1 अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। इसे ही अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं।
‘हरि-हर’ संयोग का महत्व: इस महीने के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) हैं और शिवरात्रि तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं, इसलिए इस दिन को ‘हरि-हर’ का संयुक्त आशीर्वाद का केंद्र माना जाता है।
पार्थिव (मिट्टी) शिवलिंग पूजा का महत्व
शिव महापुराण के अनुसार, अधिक मास की शिवरात्रि के दिन मिट्टी से शिवलिंग (Parthiv Shivling Puja) बनाकर उनका विधि-विधान से पूजन करने का विशेष फल है:
- मानसिक और शारीरिक आरोग्यता: पवित्र मिट्टी से निर्मित शिवलिंग की पूजा और जलाभिषेक करने से पुराने से पुराने शारीरिक कष्ट और मानसिक तनाव दूर होते हैं।
- शीघ्र विवाह के योग: शास्त्रों के अनुसार, यदि कुंवारी कन्याएं इस दिन पूरी निष्ठा के साथ पार्थिव शिवलिंग का पूजन करती हैं, तो उनके विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषीय लाभ: राहु-केतु, शनि और विष दोष से मुक्ति
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जून 2026 में आने वाली यह शिवरात्रि ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को शांत करने का एक अचूक और दुर्लभ अवसर है:
- शनि-राहु कष्टों से राहत: यदि आपकी कुंडली में राहु-केतु की स्थिति खराब है, या आप शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से पीड़ित हैं, तो इस दिन प्रदोष काल में शिव पूजा करने से कष्टों से भारी राहत मिलती है।
- विष दोष निवारण: कुंडली में चंद्रमा की कमजोरी से बनने वाले ‘विष दोष’ के प्रभाव को कम करने में भी यह दिन कारगर माना गया है। आर्थिक तंगी या व्यापारिक नुकसान से जूझ रहे लोगों के लिए भी यह दिन सौभाग्य लेकर आता है।
शास्त्रों के अनुसार व्रत के नियम: क्या करें और क्या न करें?
| क्या करें? | क्या न करें? |
| सफेद या हल्के रंग के साफ कपड़े पहनें। | कोई भी नया मांगलिक कार्य (विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) न करें। |
| ‘ॐ नमः शिवाय’ महामंत्र का निरंतर जाप करें। | व्रत के दौरान किसी का अपमान या कटु वचनों का प्रयोग न करें। |
| ध्यान (Meditation) और योग को दिनचर्या में शामिल करें। | क्रोध और नकारात्मक विचारों से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें। |
प्रामाणिक और सरल पूजा विधि
यदि आप इस महासंयोग का पूरा पुण्य लाभ उठाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करें:
1. सुबह का संकल्प और शुद्धि (ब्रह्म मुहूर्त)
चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए इस दिन सफेद या हल्के रंग के साफ कपड़े पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
2. दीप प्रज्वलन और प्रारंभिक पूजा (प्रातः काल)
घर के मंदिर की साफ-सफाई करें। भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित कर एक दीपक उनके समक्ष और एक मुख्य शिवलिंग के पास जलाएं। अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या निर्जला व्रत की शुरुआत करें।
3. पार्थिव शिवलिंग की स्थापना (प्रदोष काल – शाम का समय)
शाम के समय (सूर्यास्त के आसपास) किसी पवित्र स्थान की मिट्टी से छोटा सा शिवलिंग बनाएं। यदि घर पर संभव न हो, तो किसी शिव मंदिर में जाएं। शिवलिंग को साफ चौकी पर स्थापित करें।
4. पंचामृत अभिषेक और मंत्र जाप (मुख्य अनुष्ठान)
शिवलिंग पर क्रमशः गाय का कच्चा दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल और बेलपत्र अर्पित करते हुए पंचामृत से अभिषेक करें। अभिषेक के दौरान निरंतर ‘ॐ नमः शिवाय’ महामंत्र का मन ही मन जाप करते रहें। अंत में आरती करें और भक्तों में प्रसाद जरूर बांटें।
