नई दिल्ली: संसद में सरकार और विपक्ष के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति में उभर रहे नए घटनाक्रमों को लेकर यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले समय में केंद्र की एनडीए सरकार को संसद में अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में पहले की तुलना में अधिक सहूलियत मिल सकती है। पिछले संसदीय सत्र में विपक्षी दलों की एकजुटता ने सरकार के कई महत्वपूर्ण विधेयकों के सामने चुनौती खड़ी की थी। उस समय तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की संयुक्त ताकत सरकार के लिए बड़ी बाधा मानी जा रही थी। हालांकि अब विपक्षी खेमे में बदलते राजनीतिक हालात नई तस्वीर पेश कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान और नेतृत्व को लेकर उठे सवालों ने पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह असंतोष आगे बढ़ता है तो इसका असर पार्टी की संसदीय ताकत और रणनीति पर भी पड़ सकता है। वहीं तमिलनाडु में द्रमुक के सामने भी नए राजनीतिक समीकरण उभर रहे हैं। राज्य की राजनीति में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सहयोगी दलों के बदलते रुख को देखते हुए माना जा रहा है कि पार्टी केंद्र सरकार के प्रति पहले की तुलना में अधिक व्यावहारिक रुख अपना सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच बढ़ती दूरी और क्षेत्रीय दलों के बदलते रुख का सीधा असर संसद की कार्यवाही पर पड़ सकता है। यदि विपक्ष पहले जैसी एकजुटता बनाए रखने में सफल नहीं होता है, तो एनडीए सरकार को अपने महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत प्रस्तावों को पारित कराने में अपेक्षाकृत कम राजनीतिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच सत्ता पक्ष को उम्मीद है कि संसद के भीतर उसके लिए माहौल पहले की तुलना में अधिक अनुकूल हो सकता है। वहीं विपक्ष के सामने अपनी एकजुटता और प्रभाव बनाए रखने की चुनौती और भी बड़ी होती दिखाई दे रही है।
