चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई आज, 2023 के नए कानून की वैधता पर सवाल

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई आज, 2023 के नए कानून की वैधता पर सवाल

Johar News Times
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सुप्रीम कोर्ट आज उस याचिका पर फिर सुनवाई करेगा, जिसमें 2023 के उस कानून को चुनौती दी गई है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटा दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्रभावित करता है।

यह विवाद 2023 में बने उस नए कानून से जुड़ा है, जिसमें पहले की व्यवस्था को बदल दिया गया था। पूर्व व्यवस्था के तहत प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI की समिति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करती थी। लेकिन नए कानून में CJI की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इस बदलाव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्र भूमिका कमजोर हो सकती है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ मामले में निर्देश दिया था कि जब तक नया कानून नहीं बनता, तब तक नियुक्तियां इसी तीन सदस्यीय समिति द्वारा की जाएंगी। बाद में केंद्र सरकार द्वारा 29 दिसंबर 2023 को कानून में संशोधन कर नई चयन प्रक्रिया लागू कर दी गई।

नए कानून के अनुसार, विधि मंत्री और दो केंद्रीय सचिवों की सर्च कमेटी पाँच नामों को शॉर्टलिस्ट कर चयन समिति को भेजती है। इसके बाद प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता की तीन सदस्यीय समिति अंतिम चयन करती है, जिसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी से नियुक्ति होती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के फैसले के विपरीत है और इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कमजोर होती है। वहीं, विपक्ष ने भी इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए इसे “औपचारिकता मात्र” बताया है और कहा है कि इससे चयन पहले से तय जैसा प्रतीत होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 14 मई की सुनवाई में केंद्र सरकार से यह सवाल भी किया था कि यदि नियुक्ति का अंतिम निर्णय सरकार को ही करना है तो चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल करने का औचित्य क्या है। वहीं 6 मई की सुनवाई में कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि क्या अदालत संसद को कानून बनाने का निर्देश दे सकती है, क्योंकि कानून निर्माण का अधिकार संसद का है। अब सभी की नजरें आज होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जिसमें इस संवैधानिक और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर आगे की दिशा तय हो सकती है।

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