सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ प्रखंड अंतर्गत पिलीद निवासी एवं भूगोल शिक्षक गुणधाम मुतरुआर ने जनगणना में “जाति-कुड़मि” और “भाषा-कुड़मालि” दर्ज करने की अपील करते हुए समाज की पहचान, इतिहास और अस्तित्व से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने अपने लेख में कहा है कि बृहद छोटानागपुर क्षेत्र में निवास करने वाला कुड़मि समाज अपनी अलग संस्कृति, परंपरा, कृषि जीवन और सामाजिक व्यवस्था के कारण सदियों से विशिष्ट पहचान रखता आया है, लेकिन प्रशासनिक त्रुटियों और भाषाई बदलावों के कारण समाज की मूल पहचान प्रभावित हुई है।
लेख में दावा किया गया है कि अंग्रेजी लेखन के दौरान “कुड़मि” शब्द के उच्चारण और वर्तनी में हुई गलतियों के कारण धीरे-धीरे इसे “कुर्मी” के रूप में दर्ज किया जाने लगा। इसका असर सरकारी दस्तावेजों, जनगणना और खतियान तक में दिखाई दिया। लेखक के अनुसार, इसी कारण छोटानागपुर के मूल कुड़मि समाज की अलग पहचान धुंधली होती गई।
उन्होंने कहा कि कुड़मि समाज की मातृभाषा “कुड़मालि” भी उसकी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। भाषा के संरक्षण के बिना समाज की संस्कृति और इतिहास को सुरक्षित रखना संभव नहीं है। इसलिए समाज के लोगों से अपनी जाति “कुड़मि” और भाषा “कुड़मालि” लिखने तथा नई पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक करने की अपील की गई है।

लेख में यह भी कहा गया है कि खतियान और सरकारी अभिलेखों में सुधार संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत संभव है। इसके लिए समाज को संगठित होकर जागरूकता अभियान चलाने और अपने ऐतिहासिक दस्तावेजों को मजबूत करने की आवश्यकता है।
गुणधाम मुतरुआर ने इसे केवल शब्दों का विवाद नहीं, बल्कि सम्मान, इतिहास, संस्कृति और अधिकार की लड़ाई बताया है। उन्होंने कहा कि यदि समाज अपनी मूल पहचान के प्रति सजग नहीं रहा, तो आने वाली पीढ़ियां अपने वास्तविक इतिहास से वंचित हो सकती हैं।
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