सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि ससुराल पक्ष के सदस्य केवल पति-पत्नी के झगड़े में मूकदर्शक बने रहते हैं या हस्तक्षेप नहीं करते, तो सिर्फ इसी आधार पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत क्रूरता या दहेज उत्पीड़न का मामला नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने कहा कि नैतिक दृष्टि से ऐसा व्यवहार अनुचित हो सकता है, लेकिन इसे आपराधिक दायित्व नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. के. सिंह की पीठ ने कहा कि अक्सर वैवाहिक विवादों में पति के साथ पूरे परिवार को आरोपी बना दिया जाता है, जबकि कई मामलों में उनके खिलाफ कोई विशिष्ट या प्रत्यक्ष आरोप नहीं होते। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी रिश्तेदार को आरोपी बनाने के लिए उसके खिलाफ क्रूरता, उत्पीड़न या दहेज मांग में सक्रिय भूमिका के स्पष्ट और ठोस आरोप आवश्यक हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल किसी का चुप रहना, विवाद में हस्तक्षेप न करना या किसी पक्ष का समर्थन करना अपने आप में अपराध नहीं बनता। जब तक किसी व्यक्ति की साजिश, उत्पीड़न या दहेज मांग में सीधी भागीदारी साबित न हो, तब तक उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं है।
यह मामला मध्य प्रदेश के गुना जिले से जुड़ा था, जहां एक महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर दहेज उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पति के रिश्तेदारों के खिलाफ ठोस और विशिष्ट आरोप नहीं थे, जिसके आधार पर उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया गया। अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों में भावनात्मक तनाव के कारण कई बार पूरे परिवार को आरोपी बना दिया जाता है, इसलिए जांच एजेंसियों और अदालतों को बेहद सावधानी से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केवल उन्हीं लोगों पर कार्रवाई हो जिनकी भूमिका स्पष्ट रूप से साबित होती है।
