नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग (ECI) के अधिकारों को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया असंवैधानिक नहीं है और इसे केवल इसलिए अवैध नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सामान्य वोटर लिस्ट संशोधन से अलग है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार चुनाव आयोग के पास संवैधानिक रूप से मौजूद है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटने का मतलब उसकी नागरिकता समाप्त होना नहीं है। नागरिकता तय करने का अधिकार केवल सक्षम प्राधिकारी के पास है।
SIR प्रक्रिया की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी, जिसे बाद में पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में लागू किया गया। इसके तहत 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वाले लोगों से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए थे, ताकि उनके पूर्वजों की सूची से मिलान कर पात्रता तय की जा सके।
इस प्रक्रिया को लेकर ADR और PUCL सहित कई संगठनों ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि यह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, NRC जैसी प्रक्रिया है और इससे गरीब, प्रवासी व वंचित मतदाताओं के नाम कट सकते हैं। वहीं चुनाव आयोग ने दलील दी थी कि यह उसका संवैधानिक कर्तव्य है कि मतदाता सूची को शुद्ध रखा जाए और मृत, स्थानांतरित व डुप्लीकेट नाम हटाए जाएं। आयोग ने इसे नागरिकता जांच नहीं बल्कि प्रशासनिक सत्यापन बताया था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को भी सत्यापन दस्तावेज के रूप में शामिल करने की अनुमति देने जैसे अंतरिम निर्देश दिए थे, ताकि मतदाताओं को परेशानी न हो। अंतिम फैसले में अदालत ने दोहराया कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह वैध है और चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
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