देश की आज़ादी के सात दशक (70 साल) से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी पश्चिमी सिंहभूम जिले के सोनुआ प्रखंड अंतर्गत दो गांवों के लोग आज भी बुनियादी जरूरत यानी पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। सोनुआ क्षेत्र के ‘बनुआ’ और ‘सोनापोस’ गांव के ग्रामीणों ने अब इस घोर प्रशासनिक उपेक्षा के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए “पेयजल जन आंदोलन” का बिगुल फूंक दिया है।
चापाकल फेल, 2 किलोमीटर दूर से पानी लाने की मजबूरी
ग्रामीणों ने व्यथा सुनाते हुए कहा कि गांवों में लगे चापाकलों से पानी नहीं निकलता है, जिससे पूरा इलाका भीषण पेयजल संकट का सामना कर रहा है। गांव की महिलाओं और बुजुर्गों को रोज पीने और खाना बनाने के पानी के लिए तपती धूप में दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
अजीब विडंबना यह है कि करीब 15 वर्ष पहले इस क्षेत्र के लिए एक सरकारी ग्रामीण जलापूर्ति योजना स्वीकृत की गई थी और बुनियादी ढांचा भी बना था, लेकिन विभागीय लापरवाही के कारण वह योजना आज तक चालू नहीं हो सकी।
आजसू नेताओं के नेतृत्व में हुई ग्रामसभा, प्रशासन को एक महीने का अल्टीमेटम
पेयजल संकट से उग्र हुए ग्रामीणों ने बुधवार को क्षेत्र के युवा आजसू नेता अमित महतो और आजसू के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी डॉ. दिनेश चंद्र बोयपाई के नेतृत्व में एक विशाल ग्रामसभा का आयोजन किया।
ग्रामसभा में सर्वसम्मति से जिले के उपायुक्त के नाम एक मांगपत्र तैयार किया गया। ग्रामीणों ने जिला और प्रखंड प्रशासन को एक महीने का अल्टीमेटम देते हुए साफ चेतावनी दी है कि यदि तय समय सीमा के भीतर गांवों में शुद्ध पेयजल की आपूर्ति बहाल नहीं की गई, तो पूरा गांव जिला और प्रखंड मुख्यालय के समक्ष अनिश्चितकालीन ‘आमरण अनशन’ पर बैठने को विवश होगा।
ग्रामीणों ने उठाए विकास के दावों पर सवाल
आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकारें बड़े-बड़े विकास के दावे करती हैं, लेकिन धरातल पर बनुआ और सोनापोस जैसी बस्तियों में आदिम युग जैसी स्थिति है। पानी जैसी मूलभूत सुविधा के लिए ग्रामीणों को सड़क पर उतरना पड़ रहा है, जो पूरे सिस्टम के लिए शर्मनाक है।
