कोलकाता, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) एक नए राजनीतिक संकट में घिर गई है। पार्टी के भीतर कथित फर्जी हस्ताक्षर विवाद, जिसे अब ‘साइनगेट’ कहा जा रहा है, ने नेतृत्व और संगठन दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
विवाद विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन से जुड़े दस्तावेजों को लेकर है। आरोप है कि वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए प्रस्ताव में कुछ विधायकों के हस्ताक्षर उनकी सहमति के बिना किए गए या फर्जी थे। इस मामले को सबसे पहले टीएमसी विधायक रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने सार्वजनिक रूप से उठाया।
शिकायत के बाद विधानसभा सचिवालय की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर पश्चिम बंगाल सीआईडी ने जांच शुरू कर दी है। मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया है। जांच एजेंसियां संबंधित विधायकों के बयान दर्ज कर रही हैं और हैंडराइटिंग विशेषज्ञों की मदद से हस्ताक्षरों का मिलान किया जा रहा है। विवाद ने तब और तूल पकड़ लिया जब सीआईडी ने टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बर्नजी को पूछताछ के लिए समन भेजा। संदीपन साहा ने आरोप लगाया कि महासचिव होने के नाते दस्तावेजों की जिम्मेदारी अभिषेक बनर्जी की थी और सूची में हुई कथित गड़बड़ियों पर उनसे जवाब मांगा जाना चाहिए।

वहीं पार्टी नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने वाले विधायक रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया है। इस कार्रवाई ने टीएमसी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और असंतोष को और उजागर कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद चुनावी हार झेल चुकी टीएमसी के लिए यह विवाद बड़ा झटका साबित हो सकता है। एक ओर पार्टी विपक्ष में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर ‘साइनगेट’ विवाद ने उसकी एकजुटता और संगठनात्मक अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
