कटक, उत्कल साहित्य समाज और ओड़िया जनगणना जागरण समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘जनगणना और ओड़िया भाषा’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने सीमावर्ती क्षेत्रों और राज्य के बाहर रहने वाले ओड़िया समुदाय से आगामी जनगणना में अपनी मातृभाषा एवं पहचान ओड़िया के रूप में दर्ज कराने की अपील की। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता दिनेश पड़ेगी ने कहा कि किसी भाषा का भविष्य जनगणना में दर्ज उसकी आबादी पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर समेत झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में ओड़िया भाषा का दायरा लगातार सिमट रहा है। विशेष रूप से सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां में ओड़िया माध्यम विद्यालयों की संख्या में कमी चिंता का विषय है।
कार्यक्रम का उद्घाटन ओडिशा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बिमल प्रसाद दास ने किया। उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में ओड़िया भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता बताई। वक्ताओं ने ओड़िया भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक समन्वय समिति गठित करने की भी मांग की। अध्यक्षता डॉ. गोविंद चंद्र चांद ने की, जबकि डॉ. ओंकार मोहंती, डॉ. भृगु बक्सीपात्र, डॉ. निरंजन त्रिपाठी और चित्तरंजन मोहंती ने भी विचार रखे। महासचिव राजीव पड़ेगी ने स्वागत भाषण दिया। वक्ताओं ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का आधार है, इसलिए इसके संरक्षण के लिए समाज और सरकार दोनों को मिलकर कार्य करना होगा।
