आनंद मार्ग प्रचारक संघ के मुख्यालय में आयोजित तीन दिवसीय ‘धर्म महासम्मेलन’ में पर्यावरण और मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्संबंधों पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस महासम्मेलन में भाग लेने के लिए पूर्वी सिंहभूम जिले से हजारों की संख्या में आनंद मार्गी पुरुलिया पहुंचे हैं।
आनन्द पूर्णिमा के पावन अवसर पर “रिनासां यूनिवर्सल” मंच से विषय “प्रदूषण और मानसिक स्वास्थ्य” पर व्याख्यान देते हुए संघ के पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने कहा कि आज पूरी मानव सभ्यता दो सबसे बड़े संकटों—पर्यावरण प्रदूषण और मानसिक प्रदूषण—का सामना कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रदूषण केवल हवा, पानी या मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के मन और आध्यात्मिक जीवन को भी खोखला कर रहा है।
मानसिक प्रदूषण ही है बाह्य प्रदूषण की असली जड़
आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने आनंद मार्ग दर्शन के हवाले से कहा कि लोभ, भय, क्रोध, घृणा, संकीर्णता और अत्यधिक भोगवाद मानसिक प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।
“प्रकृति का अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण विनाश वास्तव में मनुष्य की लोभ-प्रधान मानसिकता का ही परिणाम है। प्रदूषित मानसिकता न केवल व्यक्ति के विवेक और नैतिकता को क्षीण करती है, बल्कि समाज और प्रकृति के संतुलन को भी नष्ट करती है।”
उन्होंने आनंद मार्ग के संस्थापक श्री श्री आनन्दमूर्ति जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल विज्ञान और तकनीक से दुनिया की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता; इसके लिए नैतिकता और चेतना का विकास अनिवार्य है।
आधुनिक विज्ञान भी मान रहा है खतरा
पुरोधा प्रमुख ने बताया कि आज का आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी यह प्रमाणित कर रहा है कि वायु और ध्वनि प्रदूषण सीधे तौर पर इंसानी दिमाग को प्रभावित कर रहे हैं।
- तनाव और अवसाद: दूषित वातावरण से चिंता, अवसाद और स्मरणशक्ति में कमी आ रही है।
- अति-शोर का प्रभाव: अत्यधिक शोर मानसिक अशांति और अनिद्रा को जन्म देता है।
- डिजिटल प्रदूषण: हिंसक और उत्तेजक दृश्य सामग्रियां मन की स्थिरता को पूरी तरह नष्ट कर रही हैं।
उन्होंने ‘सामाजिक प्रदूषण’ (जैसे- भ्रष्टाचार, हिंसा, अन्याय और नैतिक पतन) को भौतिक प्रदूषण से भी अधिक खतरनाक बताया, क्योंकि यह समाज में भय और अविश्वास पैदा करता है।
ध्यान-साधना, सात्त्विक आहार और ‘नव्य-मानवतावाद’
मानसिक स्वास्थ्य को दोबारा बेहतर बनाने और पर्यावरण को बचाने के लिए आनंद मार्ग ने निम्नलिखित सूत्र दिए हैं:
- नियमित ध्यान-साधना: साधना मन को संतुलित, एकाग्र और तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी शांत बनाए रखती है।
- नैतिक जीवन व सात्त्विक आहार: यम-नियम पर आधारित जीवन और सात्त्विक शाकाहारी भोजन मानसिक शुद्धि के लिए आवश्यक है।
- नव्य-मानवतावाद: इसके तहत समस्त जीव-जगत को परम चेतना का हिस्सा मानकर पशु-पक्षियों, वृक्षों और पर्यावरण के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता विकसित करना ही वास्तविक चेतना है।
“प्रदूषित वातावरण मन को अशांत बनाता है और प्रदूषित मन पर्यावरण को नष्ट करता है। स्थायी समाधान के लिए बाह्य पर्यावरण की शुद्धि के साथ-साथ मानसिक एवं आध्यात्मिक शुद्धि भी अनिवार्य है।”
