तिरुवनंतपुरम, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के सभी छंदों के गायन को अनिवार्य किए जाने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत का सम्मान सभी करते हैं, लेकिन हर कार्यक्रम में इसका पूरा संस्करण गाना लोगों के लिए बोझिल और अव्यावहारिक हो सकता है।
थरूर ने कहा, “वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मान में खड़े होते हैं। इसके शुरुआती एक-दो छंद अधिकांश लोगों को याद होते हैं। लंबे समय से परंपरा रही है कि कार्यक्रम की शुरुआत में वंदे मातरम् और अंत में राष्ट्रगान गाया जाता है।”
उन्होंने फरवरी में दिल्ली में उपराष्ट्रपति की उपस्थिति वाले एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि वहां शुरुआत और समापन दोनों अवसरों पर वंदे मातरम् का पूरा संस्करण बजाया गया था। “गीत लंबा होने के कारण लोगों को दो बार लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ा, जो असुविधाजनक था,” उन्होंने कहा।
थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन “एक छोटे से कार्यक्रम में पूरे गीत को दो बार गाना मेरी समझ से बाहर है। मुझे इसका कोई तर्क नजर नहीं आता।” उन्होंने यह भी कहा कि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो इसे अनिवार्य बनाता हो।
मंगलवार को अपने बयान को दोहराते हुए थरूर ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से वंदे मातरम् के शुरुआती छंद गाने की परंपरा रही है। उन्होंने भाजपा पर इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया और कहा कि भाजपा नेता पहले स्वयं सभी छंद गाकर दिखाएं। गौरतलब है कि केंद्र सरकार के नए दिशानिर्देशों के अनुसार सरकारी, शैक्षणिक और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण गाया जा सकता है। इस संस्करण की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है, जबकि अब तक आमतौर पर इसके शुरुआती छंद ही गाए जाते रहे हैं।
थरूर ने उम्मीद जताई कि इस विवाद का समाधान “आपसी सहमति” से निकल आएगा और राष्ट्रगीत के सम्मान तथा व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा।
