गुवाहाटी : असम सरकार ने विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर बड़ा कदम उठाया है। प्रस्तावित बिल में लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी ढांचा देने के साथ-साथ बहुविवाह (पोलिगैमी) पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। राज्य सरकार का दावा है कि इस कानून का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण
प्रस्तावित UCC बिल के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का आधिकारिक पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे रिश्तों में रहने वाले पार्टनर्स और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनी सुरक्षा और अधिकार मिल सकेंगे।
बहुविवाह पर लगेगी रोक
बिल में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह कानून लागू होता है, तो राज्य में एक से अधिक विवाह करने की अनुमति नहीं होगी। इसे समान नागरिक कानून लागू करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
विवाह की न्यूनतम आयु तय
विधेयक में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है। इसके अलावा शादी और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य करने का भी प्रावधान रखा गया है।
उत्तराधिकार के लिए समान नियम
प्रस्तावित कानून में संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों के लिए एक समान नियम लागू करने की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि इससे अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न विवादों और असमानताओं को कम किया जा सकेगा।
अनुसूचित जनजातियों को दायरे से बाहर रखा गया
असम सरकार ने स्पष्ट किया है कि राज्य की अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) को इस विधेयक के दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि पारंपरिक रीति-रिवाजों और संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है।
विपक्ष ने किया विरोध
विधानसभा में बिल पेश होने के बाद विपक्षी दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और रायजोर दल ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार बिना व्यापक जनपरामर्श के UCC लागू करने की कोशिश कर रही है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इतने बड़े सामाजिक और कानूनी बदलाव से पहले सभी समुदायों और सामाजिक संगठनों से विस्तृत चर्चा की जानी चाहिए थी। असम में UCC बिल पेश होने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। भाजपा इसे सामाजिक सुधार और समानता की दिशा में कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा करार दे रहा है। आने वाले दिनों में इस विधेयक को लेकर विधानसभा और राज्य की राजनीति में व्यापक बहस देखने को मिल सकती है।
